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सोमवार, अगस्त 22, 2011

जन्मस्थामी के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाये



कदंब का पेड़
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता जमना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्‍हैया बनता धीरे-धीरे
ले देती यदि मुझे बाँसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
तुम्‍हें नहीं कुछ कहता, पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्‍मा ऊँचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बाँसुरी बजाता
अम्‍मा-अम्‍मा कह बंसी के स्‍वर में तुम्‍हें बुलाता
सुनकर मेरी बंसी माँ तुम कितनी ख़ुश हो जातीं
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं
तुमको आती देख, बाँसुरी रख मैं चुप हो जाता
एक बार माँ कह, पत्‍तों में धीरे से छिप जाता
तुम हो चकित देखती, चारों ओर न मुझको पातीं
व्‍या‍कुल-सी हो तब, कदंब के नीचे तक आ जातीं
पत्‍तों का मरमर स्‍वर सुन, जब ऊपर आँख उठातीं
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं
ग़ुस्‍सा होकर मुझे डाँटतीं, कहतीं नीचे आ जा
पर जब मैं न उतरता, हँसकर कहतीं मुन्‍ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्‍हें मिठाई दूंगी
नए खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी
मैं हँसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वहीं कहीं पत्‍तों में छिपकर, फिर बाँसुरी बजाता
बहुत बुलाने पर भी जब माँ नहीं उतरकर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्‍हारा बहुत विकल हो जाता
तुम आँचल फैलाकर अम्‍मा वहीं पेड़ के नीचे
ईश्‍वर से कुछ विनती करतीं, बैठी आँखें मीचे
तुम्‍हें ध्‍यान में लगी देख मैं, धीरे-धीरे आता
और तुम्‍हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता
तुम घबराकर आँख खोलतीं पर माँ खुश हो जातीं
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे ।।